Friday, February 13, 2015

haar nahi manuga

अटल जी की एक कविता है जिसकी ये पंक्तियाँ हैं:

हार नहीं मानूंगा , रार नयी ठानूंगा। 

पता नहीं कैसे अचानक से याद आ गयी. शायद हालत ऐसे हैं इसलिए . मन एक तरह से हार मान ही चुका है. और में अपने मैं को समझने की कोशिश कर रही हु. लो जी।  दूसरी पंक्तियाँ याद आ गयीं. 

दिल को समझना कह दो क्या आसान है। 
दिल तो फितरत से ही सुन लो न बेईमान है. 

ये एक गीत का अंतरा है. फिल्म खोया खोया चाँद से. 

जब से उदास हूँ  खुद को बहला रही  हूँ कुछ नज़्मों , कुछ गीतों और कुछ किताबों से. किताबें कौनसी? जादू वाली. जिसमे कोई न कोई फरिश्ता आता है राह दिखने के लिए. मेरी मदद के लिए भी कोई आएगा, नहीं तो मेरे गॉड जी ही ऊपर से कोई सिग्नल देंगे. आज मुझे वापस ल कर यहीं खड़ा कर दिया. इस ब्लॉग के सामने। ये भी तो एक सिग्नल ही  है।

अच्छा देखते हैं और क्या क्या याद याद  आता है.

टूटा टूटा एक परिंदा ऐसे टूटा, की फिर जुड़ न पाया।
लूटा लूटा किसने उसको ऐसे लूटा, की फिर उड़ न पाया।
गिरता हुआ वो आसमा से आ कर गिरा ज़मीन पर।
आँखों में फिर भी बादल  ही थे वो कहता रहा मगर.
की अल्लाह के बन्दे हँस दे अल्लाह के बंदे।
अल्लाह के बन्दे हंस दे, जो भी हो कल फिर आयेगा। 

Thursday, September 15, 2011

Dagny Taggart.

What is it about dagny that resembels me. Or there is something in me that resembles dagny. this question used to resonate in mind since the time I had first read 'Atlas Shrugged'. I found the answer to this question in another book of Ayn Rand called 'We the Living'. Kira says to anderi in certain context that although she doesn't believe in souls, but if they were to posses any they would find out that the root of their souls is same.
Now I can understand the conversation between dagny and cherryl in 'Atlas Shrugged', when dagny asks cherryl to hold on to the feeling which tells her that her life is to be regarded above everything else. This feeling is correct. and no one the wold has the right to deny it.
I can't compromise. not when for my whole life i have held on to the thought that this one decision of my life is going to be the proof of what i am. what i have stood for. what i believe in. as if it is my only reverence. I cannot compromise in that. even thinking about a compromise makes me feel sick. I cant give up. I won't give up.





Friday, December 3, 2010

कृष्णकली.

शायद ये नाम ही काफी होगा उन लोगों के लिए जो ये किताब पढ़ चुके हैं। मैंने ये किताब कई बार पढ़ी है, और हर बार कलीके व्यक्तित्व का एक नया पहलू मेरे सामने उजागर हुआ। खैर , आइये शुरुवात से शुरू करते हैं। कृष्णकली एक उपन्यास है शिवानी द्वारा लिखा गया। शिवानी हमेशा से मेरी प्रिय लिखिका रही हैं, हिंदी साहित्य जितना भी पढ़ा उसमे शायद शिवानी की किताबें ही सबसे ज्याद पढ़ी हैं। मुझे आज भी याद हैं वो दिन जब में अपने इंजीनियरिंग की परीक्षाओं के बीच में भी शिवानी की किताबें पढने का वक़्त निकाल लेती थी।
ऐसा ही एक दिन था, शायद कॉलेज में मेरे पहले ही साल में, जब शाम के वक़्त मैंने पहली बार ये उपन्यास पढ़ कर ख़त्म किया था। उस वक़्त जो मेरी मनोदशा थी वो वैसी ही थी जैसी 'गुनाहों का देवता' पढने के बाद हुई थी।
क्या कहूँ कली के बारे मे ? सुना है की जब ये कहानी अखबार में छपा करती थी तो आखरी भाग आने के बाद हंगामा हो गया था की कली मर गयी। और क्यों न होता हंगामा? एक चुलबुली सी लड़की, जो ज़िन्दगी भर बड़ी ही हिम्मत के साथ हर मुश्किल का सामना करती है, आखिर में चुपचाप चली गयी। उसका हासिल कुछ भी नहीं।
सोचो तो अजीब लगता है। अगर हर इंसान हमेशा ये सोच कर मुश्किलों से लड़ता जाये की अंत में सब ठीक हो जायेगा और अचानक से उसकी ज़िन्दगी ख़त्म हो जाये तो?
कली के जीवन का आरम्भ ही विचित्र परिस्तिथियों में हुआ। अपने स्वयं के माता पिता को उसने कभी देखा नहीं , और उम्र के १७ वर्षो तक जिन्हें माता पिता समझती रही , वो उसे नहीं समझ पाए। ऊपर से चंचल और हठी दिखने वाली वो लड़की भीतर से कितनी सहमी हुई थी, ये हम पाठक भी तभी समझ पाए जब उसने प्रवीर को अपनी जीवन गाथा सुनाई। एक ऐसी लड़की जिसने अपने सौंदर्य और बुद्धिमत्ता से संसार को परास्त किया पर स्वयं अपने अतीत और अपनी जड़ों को नहीं हरा पाई।
प्रवीर और कली का रिश्ता कभी बन ही न पाया की बिगड़ता। कली का प्रवीर की तरफ खिचाव और प्रवीर का उस से कटे हुए रहना, ये सब जब तक सुलझ पता, बड़ी देर हो गयी थी। प्रवीर की सगाई हुई और उसके अगले ही दिन वो ये जान पाया की कली के कठोर बाहरी कवच के भीतर एक घबरायी हुई, सहमी हुई लड़की है। एक ऐसी लड़की जो सहारा भी चाहती है और उस से दूर भी भागती है, जो साथ भी चलना चाहती है और डरती भी है की कहीं साथ छूट न जाये। बाकि जो हुआ वो कहने और सुनने का कोई मतलब नहीं है।
बस कहानी का अंत यही है की कली चली गयी। और अब मुझसे लिखा नहीं जा रहा है। शायद हर कहानी का अंत ऐसा ही होता है। कोई कभी नहीं समझ पता किसी और को। और जब तक समझने की कोशिश करता है तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।

Monday, May 3, 2010

सदमा तो है.............

सदमा तो है मुझे भी कि तुझसे जुदा हूँ मैं,

लेकिन ये सोचता हूँ की अब तेरा क्या हूँ मैं।

जाने किस अदा से लिया तूने मेरा नाम,

दुनिया समझ रही है सब कुछ तेरा हूँ मैं।

(क़तील शिफाई)

इसके अलावा और क्या कहूं समझ नहीं आ रहा। ये सदमा भी अजीब शब्द होता है। तीन अक्षरों में सही हालत बयान कर देता है। इंसान कि कुछ भी महसूस करने कि शक्ति का ख़त्म हो जाना, हर चाहत ख़तम हो जाना, हर उम्मीद ख़त्म हो जाना, यही तो सदमा होता है। यही तो है जो पिछले कई दिनों से मुझे लगा है।

इस बात कि हैरानी भी कम नहीं है कि लोग किस तरह सब कुछ नकार देते हैं। हर एहसास, याद को झुठला देना बड़ा आसान होता है लोगो के लए। वक़्त हमें किस कदर बदल देता है। महज कुछ मिनटों में मेरे सारे ख्वाब ख़त्म हो गए। कहते हैं टूटे हुए सपनो कि किरचे चुभा करती हैं। मुझे तो वो एहसास भी नहीं होता, शायद दर्द ने हर एहसास ख़त्म कर दिया है।

रिश्ता इस तरह से बेमानी हो जायेगा ये नहीं सोचा था। पर अब जब हो ही गया है तो मुझे आगे का रास्ता ढूँढने में वक़्त लगेगा। कोशिश कर रही हूँ। शायद कामयाब भी हो जाऊं। अमीन।

Monday, March 15, 2010

अब मुझे कोई.......................

आखरी उम्मीद ख़त्म होने का एहसास क्या है, ये गुलज़ार साहब की इन पंक्तियों में बड़ी शिद्दत के साथ महसूस किया है। जब से ये गीत सुना है, रात में अक्सर इसे सुनकर रोई हूँ । इस से ज्यादा में कुछ नहीं कहूँगी।


अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ,
अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ,
वो जो बहते थे आबशार कहाँ
अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ।


आँख के एक गाँव में
रात को ख्वाब आते थे
छूने से बहते थे
बोले तो कहते थे
उड़ते ख्वाबों का ऐतबार कहाँ

उड़ते ख्वाबों का ऐतबार कहाँ
अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ।

जिन दिनों आप थे,
आँख में धूप थी

जिन दिनों आप रहते थे,
आँख में धूप रहती थी
अब तो जाले ही जाले हैं
ये भी जाने ही वाले हैं
वो जो था दर्द का करार कहाँ

वो जो था दर्द का करार कहाँ
अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ
वो जो बहते थे आबशार कहाँ

अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ
अब मुझे कोई इंतज़ार कहाँ।



फिल्म- इश्किया
गीतकार- गुलज़ार
संगीतकार- विशाल भारद्वाज
गायिका- रेखा भारद्वाज

Tuesday, November 24, 2009

MONA LISA SMILE.....










let me first make one point clear that i am not a very big hollywood movies freak. infact 2-3 months ago i could have counted on fingers, number of hollywood ficks i had seen. but i day while surfing channels i saw julia roberts standing in a class and teaching. now being a teacher has been my childhood dream. i decided to watch the movie for some time. and once i came across the plot i was glued to the tv.










the movie which i was watching was mona lisa smile. it is a 2003 american film. this is a story of katherine ann watson(played by julia roberts). she is a UCLA graduate and comes to wellesly college to teach art history. in this college she finds out that the girls are trained merely to be housewives and mothers. they as individuals had no goals, desires and aims. miss watson, as she is called in the film tries to encourage them to pursue a career. she tries to instill a spirit of change in her students. in doing so she faces a number of obstacles. some caused by a hard headed student betty who is also the daughter of the president of alumini association. some because of her past failed relationships and her modern approach as against the conservative environment of the college. she encourages one of her students joan to pursue a career in law which she was interested in. but joan couldn't pick up the courage to do so and gets married.



but as the session progresses katherine succeeds in changing the perception of her student towards her and also their approach towards life.






well i am not writting this post to discuss the plot of movie. what i want to express is the effcet that this movie has had on me. this movie has a lot many scenes which for me had a special message. like in a scene katherine introduces her students to he work of jason pollock. when the student mutters among themselves as whether they are required to write a paper on it and giggles, katherine replies-



" no. you are not required to write a paper on it. you are not even required to like it. but you are required to consider it."



this simple statements has a huge effect on students who watches the painting with facination and finally a smile emerges on each face. the smile very similar to the one when one gets overwhelmed by watching a sunrise. in this case this was a sunrise for perspectives.






one more statement made by katherine which stirred my soul was when she was asked about her failed relationships and she says-



"not every relationship is meant for marriage."



she was a woman who lived on her own terms, in betty's words as she described her now favourite teacher in her last editorial.






there are mixed reviews of the movie i got from internet. but for me it surely will be one of the best movies i have ever seen. katherine watson for me stands for pride, knowledge, courage and integrity. a person who gives up the job to keep her principles intact. a person whose sole motive is to show her students the right way, the way to live with dignity and cognizance. a moral code which has been mine even before the day i came to know what morals are and will be the same forever. amen.









Tuesday, August 4, 2009

faith.......

everytime i hear the words, " have faith", i smile. you know why? because thats all i have got. i have lost dreams. i have lost courage. i have lost happiness. all that is left with me is faith. faith in god that he will listen to me some day. sure he would listen. but the thing which is funniest is that i dont know what to say to him. what to ask him. i may be sounding confused! or may be out of my mind. but that is exactly how i am feeling right now. daily whenever i sit in front of the idol of god, i simply keep looking at him. i see him smiling. i dont know the reason behind his smile. i know that god loves me and will pull me out of this. but when? what does he think is the limit of my patience and my pain bearing capacity?

everytime life seems to be quite, it turns out to be the peace before the storms. i had thought that maybe after all that i have gone through was because i had to arrive at this. something which gave me peace and smiles. but that also is ruined. its like when you are finishing a race you suddenly realize that there is one more lap to go. one more struggle to survive. i know i will survive. but the part of my own soul which is dying bit by bit with each pasing day is never going to come back. i am never going to be what i used to be. its very hard to observe closely and see a small scrap of your own self turning into ashes everyday. these may seem to be mere words but this is exactly how i am feeling now a days. i dont want to let this happen but i cant help it.

i will try to keep fighting. i promise. i will win. and will try to mend my broken hopes and dreams.