Saturday, September 20, 2008

दर्द की बारिश..............

दर्द की बारिश सही मद्धम ज़रा अहिस्ता चल,

दिल की मिटटी है अभी तक नम ज़रा अहिस्ता चल।

तेरे मिलने और फिर तेरे बिछड जाने के बीच,

फासला रुसवाई का है कम ज़रा आहिस्ता चल।

अपने दिल ही में नही है उसकी महरूमी की याद,

उस की आंखों में भी है शबनम ज़रा आहिस्ता चल।

कोई भी हमसफ़र 'रशीद' न हो खुश इस कदर,

अब के लोगों में वफ़ा है कम ज़रा आहिस्ता चल।

(मुमताज़ रशीद)

Friday, September 5, 2008

आपबीती......

" जीत ले जाए कोई मुझ को नसीबों वाला,
ज़िन्दगी ने मुझे दांव पे लगा रक्खा है।"
(क़तील शिफाई )

कहते हैं की जब हम कुछ सोचते रहते हैं तो हमारे खयालातों से जुड़ी कई बातें अपने आप हमारी आंखों के सामने आने लगती हैं। पिछले दो महीनों में जो कुछ भी सहा उसके बाद यही महसूस हो रहा था की मैं तो सच मुचजिन्दगी की हाथों कठपुतली बन गई हूँ, और आज अचानक ये शेर दिख गया। लगा जैसे मेरे ही दिल की बात किसी ने शब्दों में बयां कर दी हो।

Sunday, August 31, 2008

अर्ज़ किया है..................

"पहले भी कुछ लोगों ने जौ बो कर गेहूं चाहा था,
हम भी इस उम्मीद में हैं लेकिन कब ऐसा होता है।"

ये पंक्तियाँ मुझे पढने को मिलीं जावेद अख्तर की किताब तरकश में। पढ़ कर मन प्रसन्न हो गया। इस किताब को जब भी उठाती हूँ, हर बार कोई नई पंक्ति मन को छू जाती है।

Saturday, August 2, 2008

अकेलापन.......

पिछले कुछ समय से अकेले होने का जो एहसास सुबह शाम मुझे कचोट रहा है , उसे में शब्दों में न तो बयां कर पा रही हूँ और न ही उसकी वजह समझ पा रही हूँ।आज अपने आस पास देखती हूँ तो लगता है की पिछले एक साल में सब आगे बढ़ गए हैं बस में वहीँ की वहीँ हूँ। सब मुझसे खुश हैं पर में अपने आप से अपनी जिंदगी से खुश नही हूँ। एक खालीपन है जो शायद पहले भी था पर जिसका दंश कभी इस कदर नही चुभा जिस तरह अब चुभ रहा है। सबकी नज़र में बड़े आराम की जिंदगी है मेरी। हर सेमेस्टर में टॉप करती हूँ, मेरे हाथ में नौकरी है, और मेरे माँ पापा को मुझ पर गर्व है। पर कोई भी ये नही समझ पता की एक साल पहले जिंदगी जीने की, हर मुसीबत का डट कर सामना करने की जो चाहत थी, जो जस्बा था, वो कहीं खो गया है। उसकी वजह में जानती हूँ, और मेरा भगवान् जनता है की मैंने कितनी कोशिश करी की उस शख्स को में अपने जीवन की सबसे बुरी दुर्घटना समझ कर भूल जाऊँ, पर साल भर बाद भी में वहीं हूँ। कोशिश करके कुछ वक्त तक ख़ुद पर संयम रख पाती हूँ पर फिर वही सवाल बार बाद दिलो दिमाग की दीवारों से टकराने लगता है की आख़िर क्यूं? मैं ही क्यूं? मैंने कभी भी कोई ऐसा कदम नही उठाया जिसके लिए मुझे किसी से भी नज़र मिलाने में हिचकिचाहट हो। पर अब मैं ख़ुद को इस सवाल का जवाब नही दे पति की मैं वो कैसे नही देख पाई जो सच मेरी आंखों के सामने था। जिसने धोखा दिया उसका तो कुछ नही बिगड़ा पर मेरे तो जीने की ललक खो गई । आज किसी रिश्ते पर भरोसा नही रह गया। ऐसा लगता है की शायद अब जिंदगी मैं कभी प्यार नही कर पाऊँगी। किसी पर भी विश्वास नही कर पाऊँगी। मैं पुनर्जन्म में विश्वास नही करती। मैंने जो कुछ जीया है उसका हिसाब मुझे मेरे भगवान् से इसी जन्म में चाहिए। हर उस रात का हिसाब चाहिए जब मुझे ये सोच कर नींद नही आई की मैं ग़लत कहाँ थी? बहुत कोशिश करी सब भूल कर आगे बढ़ने की। दूसरों की नज़रों में शायद मैं आगे बढ़ भी चुकी हूँ । पर अपने आप से अब और झूठ नही बोल सकती। मैं क्या करूँ ?

Sunday, July 27, 2008

what i learnt..............

"when you are down, people can pull you up but you still have to stand on your own two feet."

its so true. whenever we are in a real fix we have some people around us who help us to stand again. but the real strength to stand up again comes from within us. some people likes to live in their own miseries. i have seen a hell lot of people who are never ready to let go of any thing, any relation or any emotion. i think that is not the way life should be. life is meant to be lived with all its good and bad moments. a real winner is a person who manages to smile through tears and thus make others smile to along with him. i m trying to follow this path and i hope i will finally succeed.